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सीखने-सिखाने की एक सहज एवं प्रभावी तरीका
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बाल शोध -सीखने-सिखाने का एक सजह प्रक्रिया सीखने-सिखाने के अपने-अपने तरीके हैं | अपने-अपने अंदाज हैं | और इस अकादमिक क्षेत्र में सीखने-सिखाने से सम्बंधित बहुतेरे नाम हैं | जैसे बाल केन्द्रित शिक्षण, आनंददायी शिक्षा, प्रोजेक्ट विधि, रचनात्मक शिक्षण विधा, खोजबीन विधि [ Discovery learning of method] इत्यादि | सभी विधियों और विधाओं की अपनी-अपनी खूबियाँ हैं | खूबसूरती है | हलांकि इसकी व्याख्या भी जमीनी स्तर पर अलग-अलग देखने व सुनने को मिलता है | फिरहाल यहाँ इन शब्दों की व्याख्यात्मक विश्लेषण करना नहीं है | जरुरत यह है कि दबाव रहित हो कर हर एक बच्चा सीखने में शामिल [Involve] हो | कुछ नया सीखे | सीखने के उपरांत और सीखने के दौरान भी आनंद का अनुभव कर पाए | सीखे हुए पर पुनर्विचार करने के मौके मिले | अपेक्षित कौशलों के विकास के मौके मिले | कुछ करने का ,किये हुए को लिखने का और आत्मविश्वास हाशिल करने का अवसर मिल पाए | हमारे पाठ्यपुस्तक के शुरुआत में ‘बड़ों से दो बातें’ और आमुख के अंतर्गत पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीकों में फेरबदल की मांग करता है | आइये इसके कुछ अंश पर यहाँ गौर करें ... ...
पुस्तक समीक्षा -सब मजेदारी है ! कथा नीलगढ़
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पुस्तक समीक्षा सब मजेदारी है ! कथा नीलगढ़ इस पुस्तक को पढ़ते हुए महसूस किया कि विचार और व्यवहार से व्यक्ति के दिल में जगह बनता है | बस;थोड़ा थम के देखो , थोड़ा रम के देखो | इस जहां में खुबसूरत सी भी जगह है, वहाँ भी ज़रा ठहर के देखो | लोगों से बोलिए | बतियाए | उनके भी सुख दुःख में शामिल होइए | फिर देखिए इन्सान होने के मायने और परिभाषाओं को ढूंढने की जरुरत कम पड़ेगी | आपका व्यक्तित्व और व्यवहार हीं इन्सान होने के मायने और परिभाषाए गढ़ने लगती है | इस किताब को पढ़ते हुए महानगर के हाईवे से लेकर नीलगढ़ के घने जंगलों के आदिवासी इलाकों के कच्चे रास्तों के बीच से जोड़ता हुआ सफ़र तय किया | और नीलगढ़ के घने जंगलों के बीच ठहरा | जो अब कहीं कहीं पक्के रास्ते में बदल गया है | यह रास्ता केवल ईंट -पत्थर से बना रास्ता भर नहीं है यह रास्ता इंसानी सफ़र का भी रास्ता है | एक परंपरा में रहते हुए दूसरी परंपरा और संस्कृति में जीते हुए एक नयी राह की झलक है | इस राह में अशिक्षा , अन्याय और सरकारी योजनाओं की जिल्लत झेलने के साथ-साथ जीवन को देखने ,जीने का सहज ढंग भी शामिल है | ...
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आजमाता रहा जोर इन पत्थरों से , न पत्थर पिघला न मैं | जिंदगी की भोर ख़त्म होने वाली है न ओ हमें समझें न हम उसे समझे पर मजे की बात तो ये है कि हम दोनों समझ की बात हीं करते रहे | आजमाता रहा जोर इन पत्थरों से , न पत्थर पिघला न मैं | चल रहा था इन पैरों से पर पैरों के बारे में कभी सोचा नहीं कि जाना कहाँ है इन पैरों से बस चलता रहा ,चलता रहा कभी अविराम तो कभी विराम देता रहा इन पैरों को जब थक जाता था जब पक जाता था आजमाता रहा जोर इन पत्थरों से , न पत्थर पिघला न मैं |
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चरवाह चरवाह ,जिंदगी की दिखाव से बेपरवाह पगडन्डियों के रास्ते चल रहा है | मन में गुनगुनाता है, जिंदगी की धुन पर मन में रहती है चिंता , और रहता है संकोच | कोई सुन ना ले, मेरे दुखों का धुन मेरे सुखों का सूखापन, इस सुनसान इलाके में | पर वृक्षों की झुरमुटों ने हवाओं की फिदाओं ने निर्मल भावनाओं ने सुनती है चरवाह की धुन | शुरू होती है जिंदगी की अगली धुन जो जिंदगी की गन्दगी को धो कर, अहम के वहम को छोड़ कर जिंदगी को जिंदगी बनाती है , और चरवाह को बेपरवाह | चरवाह जिंदगी की दिखाव से बेपरवाह , पगडंडियों के रास्ते चल रहा है | जय शंकर चौबे
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लिखने की पड़ताल (जय शंकर चौबे) स्कूल की दैनिक क्रिया कलाप के बाद सभी बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में बैठते हैं | बच्चों की उपस्थिति ली जाती है | स्कूल में एक शिक्षक एक शिक्षिका हैं तथा एक शिक्षा मित्र हैं | आप सभी समय के पाबन्द हैं | बच्चों को भी कुछ न कुछ काम जरुर देते हैं | कक्षा एक व दो एक साथ ,कक्षा तीन,चार एक साथ और कक्षा पाँच बरामदे बैठ जाते हैं | कक्षा एक ,दो मे ब्लैक बोर्ड के आधे भाग में वर्णमाला आधे में अमात्रिक शब्द लिख दिए गये | बच्चें अपनी कापी में उतारने की कोशिश कर रहें हैं | तीसरी के बच्चे हिंदी की किताब से सुलेख लिख रहें हैं चौथी के बच्चे अलग-अलग पाठों के अभ्यास कार्य पूरे कर रहें हैं | अभ्यास कार्य में रिक्त स्थानों की पूर्ति ,प्रश्नोत्तर ,मिलान करना आदि काम कर रहे हैं | पांचवी के बच्चे जो कि बरामदे में बैठे हैं | यहाँ प्रधानाध्यापक जी अपनी विभागीय काम करने के बाद एक पेज की इमला स्पष्ट स्वरों में बोलते हैं | इसके बाद एक-एक बच्चे की कापी चेक कर जहाँ वर्तनी सुधार करनी है उस शब्द को लाल घेरा बना कर वहाँ शुद्ध शब्द भी लिख देते हैं | चार बच्चे शायद कुछ ज्यादा गलती लिखे थे ...